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Jashn e Eid e Ghadeer Sirsi Sadat Azadari 2026

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जश्न-ए-ईद-ए-ग़दीर (29वाँ दौर) ​हदीस/आयत: मन् कुन्तो मौलाहु फ़हाज़ा अलीयुन् मौला ​इरशाद-ए-रसूल: बमुक़ाम मैदान-ए-ग़दीर बवक़्त ज़ुह्र 18 ज़िलहिज्जा ​तारीख और समय (Date & Time) ​दिनांक: 01 जून 2026, दिन: सोमवार (Monday) ​समय: रात 08:00 बजे (08:00 PM) ​स्थान (Venue) ​इमामबारगाह कलाँ ग़र्बी, सिरसी सादात (जिला: संभल, यू.पी.) ​संरक्षण (ज़ेर-ए-सरपरस्ती) ​हज़रत साहब-उज़-ज़मान अलैहिस्सलाम ​मंच की ज़ीनत (उलेमा-ए-किराम) ​तिलावत-ए-कलाम-ए-पाक: आलीजनाब मौलाना सैयद सूफ़ी असग़र नक़वी साहब ​तिलावत-ए-हदीस-ए-किसा: आलीजनाब मौलाना सैयद शमीम हैदर रिज़वी साहब (क़ुम) ​इफ़्तेताही तक़रीर (उद्घाटन भाषण): * आलीजनाब मौलाना सैयद एहतशाम अली नक़वी साहब ​आलीजनाब मौलाना सैयद क़म्बर अब्बास नक़वी साहब (दिल्ली) ​सदारत एवं मुख्य अतिथि ​सदारत (अध्यक्षता): आलीजनाब हैदर अली ज़ैदी साहब (शौक़ ब्लंटर) ​मेहमान-ए-ख़ुसूसी (विशेष अतिथि): जनाब अली मेंहदी साहब (नाइब मंतूर) ​मंच संचालन (निज़ामत) ​जनाब नय्यर जलालपुरी साहब ​आमंत्रित शायर (शूअरा-ए-किराम) ​जनाब शौनी सरसवी (नाअत पाक) ​जनाब हैदर कर्रारपुरी साहब ​जनाब सुहैल बस्त...

Khamsa-e-Majalis 2026: Sirsi Sadat Me Khateeb-e-Ahl-e-Bait Maulana Syed Asad Yawar Sahab Ka Khitab

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Har saal ki tarah is saal bhi jannat-nishan sarzamin Sirsi Sadat (Zila Sambhal, Uttar Pradesh) me ek azeem-ush-shan aur roohani deeni ijlas ka inaqaad hone ja raha hai. Aza-e-Hussain a.s. ke josh aur gham-e-Ahl-e-Bait a.s. ki yaad ko dilon me taza karne ke liye "Khamsa-e-Majalis" (5 majalis ka silsila) ka ehtemam kiya gaya hai. ​Yeh majalis na sirf gunaho se tauba aur akhrat ki kamyabi ka zariya hain, balki inka maqsad marhoomeen ki arooh ko sukoon pahunchana bhi hai. Agar aap deen, akhlaq, aur tareekh-e-Islam ke ahem pehluon ko samajhna chahte hain, toh yeh majalis aapke liye ek behtareen mauqa hain. ​Aaiye is post me is paak mahfil aur majalis ke silsile se judi ek-ek choti-badi jankari par tafseel se nazar dalte hain. ​Majalis Ka Markazi Maqsad (برائے تسکینِ ارواحِ مومنین و مومنات) ​Is Khamsa-e-Majalis ka sabse ahem aur khusoosi maqsad "Taskeen-e-Arwah-e-Momeenin-o-Momenat" hai. Humare darmiyan se jo aziz, aqarib, aur momineen is duniya se rukhsat ho ...

इमामबाड़ा और ताबूत: शहादत की याद और अकीदत का अटूट संगम

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भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता में इमामबाड़ा केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भावनाओं, इतिहास और अकीदत (श्रद्धा) का एक ऐसा केंद्र है, जहाँ वक्त जैसे ठहर जाता है। जब हम 'शहादत' शब्द सुनते हैं, तो ज़हन में कर्बला का वह मंज़र आता है जिसने इंसानियत को हक और सच के लिए सब कुछ कुर्बान कर देने का सबक सिखाया। ​आज के इस ब्लॉग में हम बात करेंगे इमामबाड़े की उस रूहानी फिज़ा और 'ताबूत' की उस रिवायत के बारे में, जो हमें हमारे गौरवशाली और त्याग से भरे इतिहास से जोड़ती है। ​इमामबाड़ा: जहाँ आस्था और गम की सरहदें मिलती हैं ​इमामबाड़ा, जिसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में 'आशूरखाना' या 'अज़ाखाना' भी कहा जाता है, मुख्य रूप से इमाम हुसैन (अ.स.) और कर्बला के शहीदों की याद में बनाया गया स्थान है। यहाँ की दीवारें ज़िक्र-ए-हुसैन से गूंजती हैं। यह वह स्थान है जहाँ जाति, धर्म और ऊंच-नीच के भेदभाव मिट जाते हैं और इंसान केवल अपनी इंसानियत और संवेदनाओं के साथ मौजूद होता है। ​इमामबाड़े का वातावरण शांत लेकिन गंभीर होता है। यहाँ आयोजित होने वाली मजलिसें और अज़ादारी हमें याद दि...

अकीदत की एक रूहानी रात: ताबूत का जुलूस और शहादत की याद

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जब रात का सन्नाटा गहराता है, तब अकीदत के दीप और भी रौशन हो जाते हैं। हाल ही में इमामबाड़ा इस्लाम से निकाला गया ताबूत का यह जुलूस केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह इंसानियत के उस महान बलिदान को याद करने का ज़रिया था, जिसने दुनिया को हक और सच का रास्ता दिखाया। ​इस मुबारक और गमगीन मौके पर जिस तरह से अज़ादारों ने शिरकत की, वह काबिले-तारीफ है। आइए, इस रात के कुछ अहम पहलुओं पर नज़र डालते हैं। ​मौलाना नजमी साहब की खिताबत: रूह को झकझोर देने वाला बयान ​मजलिस की शुरुआत मौलाना नजमी साहब की खिताबत (Kitabat) से हुई। मौलाना ने अपने पुरअसर बयान में कर्बला के शहीदों के मकाम और उनके सब्र की दास्तां को इस तरह पेश किया कि हर आँख नम हो गई। उन्होंने समझाया कि शहादत सिर्फ एक अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत है जो हमें ज़ुल्म के खिलाफ डटने की प्रेरणा देती है। उनके शब्दों ने अज़ादारों के दिलों में दीन और इंसानियत की मोहब्बत को और गहरा कर दिया। ​नसीमुल हसन साहब का मर्सिया और सवारी: दर्द की आवाज़ ​किसी भी मजलिस की जान उसके मर्सिया ख्वानी (Marsiya recitation) में होती है। इस मौके पर जनाब ...

सहीह मुस्लिम: हदीस नंबर 6220 (2404)​बुकैर-बिन-मिस्मार ने आमिर-बिन-सअद-बिन-अबी-वक़्क़ास से, उन्होंने अपने वालिद से रिवायत की कि मुआविया-बिन-अबी-सुफ़ियान ने हज़रत सअद (रज़ि०) को हुक्म दिया, कहा: "आपको इससे क्या चीज़ रोकती है कि आप अबू-तुराब (हज़रत अली-बिन-अबी-तालिब अलैहिस्सलाम) को बुरा कहें?"​उन्होंने जवाब दिया: "जब तक मुझे वो तीन बातें याद हैं जो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन (हज़रत अली अलैहिस्सलाम) से कही थीं, मैं हरगिज़ उन्हें बुरा नहीं कहूँगा। उनमें से कोई एक बात भी मेरे लिये हो तो वो मुझे सुर्ख़ ऊँटों से ज़्यादा पसन्द होगी:​मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से सुना था, आप उनसे (उस वक़्त) कह रहे थे जब आप एक जंग में उनको पीछे छोड़कर जा रहे थे और अली (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा था: 'अल्लाह के रसूल! आप मुझे औरतों और बच्चों में पीछे छोड़कर जा रहे हैं?' तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उनसे फ़रमाया: 'तुम्हें ये पसन्द नहीं कि तुम्हारा मेरे साथ वही मक़ाम हो जो हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) का मूसा (अलैहिस्सलाम) के साथ था, मगर ये कि मेरे बाद नुबूवत नहीं है।'​इसी तरह ख़ैबर के दिन मैंने आप (सल्ल०) को ये कहते हुए सुना था: 'अब मैं झंडा उस शख़्स को दूँगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत करता है और अल्लाह और उसका रसूल उससे मुहब्बत करते हैं।' कहा: फिर हमने इस बात (को जानने) के लिये अपनी गर्दनें उठा-उठाकर (हर तरफ़) देखा तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: 'अली (अलैहिस्सलाम) को मेरे पास बुला भेजो।' उन्हें ऐसी हालत में लाया गया कि उनकी आँखें बहुत दुःख रही थीं। आपने उनकी आँखों में अपना मुँह का लुआब लगाया और झंडा उन्हें अता फ़रमा दिया। अल्लाह ने उनके हाथ पर ख़ैबर फ़तह कर दिया।​और जब ये आयत उतरी: (तो आप कह दें: आओ) हम अपने बेटों और तुम्हारे बेटों को बुला लें। (आयत-ए-मुबाहिला), तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने हज़रत अली (अलैहिस्सलाम), हज़रत फ़ातिमा (अलैहिस्सलाम), हज़रत हसन (अलैहिस्सलाम) और हज़रत हुसैन (अलैहिस्सलाम) को बुलाया और फ़रमाया: 'ऐ अल्लाह! ये मेरे घरवाले (अहले-बैत) हैं।'"​हकीकत और विचार​यह रिवायत वाज़ह करती है कि:​हज़रत सअद बिन अबी वक़्क़ास (रज़ि०) ने उन दबावों के बावजूद मौला अली (अ०) की शान में गुस्ताखी करने से साफ़ इनकार कर दिया था।​मौला अली (अ०) का मक़ाम अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल०) की नज़रों में क्या है, यह इस हदीस के तीनों वाकयात (मंज़िलत, ख़ैबर और मुबाहिला) से साबित होता है।

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सहीह मुस्लिम: हदीस नंबर 6220 (2404) ​बुकैर-बिन-मिस्मार ने आमिर-बिन-सअद-बिन-अबी-वक़्क़ास से, उन्होंने अपने वालिद से रिवायत की कि मुआविया-बिन-अबी-सुफ़ियान ने हज़रत सअद (रज़ि०) को हुक्म दिया, कहा: "आपको इससे क्या चीज़ रोकती है कि आप अबू-तुराब ( हज़रत अली-बिन-अबी-तालिब अलैहिस्सलाम ) को बुरा कहें?" ​उन्होंने जवाब दिया: "जब तक मुझे वो तीन बातें याद हैं जो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन ( हज़रत अली अलैहिस्सलाम ) से कही थीं, मैं हरगिज़ उन्हें बुरा नहीं कहूँगा। उनमें से कोई एक बात भी मेरे लिये हो तो वो मुझे सुर्ख़ ऊँटों से ज़्यादा पसन्द होगी: ​मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से सुना था, आप उनसे (उस वक़्त) कह रहे थे जब आप एक जंग में उनको पीछे छोड़कर जा रहे थे और अली (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा था: 'अल्लाह के रसूल! आप मुझे औरतों और बच्चों में पीछे छोड़कर जा रहे हैं?' तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उनसे फ़रमाया: 'तुम्हें ये पसन्द नहीं कि तुम्हारा मेरे साथ वही मक़ाम हो जो हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) का मूसा (अलैहिस्सलाम) के साथ था, मगर ये कि मेरे बाद नुबूवत नहीं है।' ​इस...

Sirsi Sadat ki Pur-Asar Azadari: Shaheer Naqi Naqvi Dalani ka Marsiya aur Imambargah Kala Gharbi ka Manzar

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Azadari-e-Husain sirf ek rasm nahi, balki ek tehzeeb hai jo sadiyon se naslon mein muntaqil hoti aa rahi hai. Jab baat Sirsi Sadat (District Sambhal, UP) ki ho, toh yahan ki azadari ka har manzar iman aur aqeedat ki ek nayi dastan sunata hai. Aaj ke is blog mein hum zikr karenge Imambargah Kala Gharbi mein honi wali us makhsoos azadari ka, jahan Shaheer Naqi Naqvi Dalani apne makhsoos lehje mein marsiye ki sada buland karte hain. ​Sirsi Sadat: Ek Tareekhi Pas-manzar ​Sirsi Sadat wo sarzameen hai jise "Sadat-e-Bariha" ke markaz ke taur par jana jata hai. Yahan ki galiyon mein aaj bhi purani imarton ki deewaron se azadari ki khushbu aati hai. Yahan ka har bacha, jawan aur buzurg Gham-e-Shabbir mein is tarah racha-basa hai ki yahan ki anjumanen aur marsiya khwani poore Hindustan mein mashhoor hai. ​Imambargah Kala Gharbi ka Maqam ​Sirsi mein yun toh kayi tareekhi imambargah hain, lekin Imambargah Kala Gharbi ki apni ek purani aur pur-waqar tareekh hai. Ye imambargah ...

Siraaj-e-Adab aur Shair-e-Ahlebait: Naqi Sirsivi Marhoom ki Yaad mein Majlis-e-Barsi

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Dunya-e-fani se har kisi ko jaana hai, lekin kuch shakhsiyatien aisi hoti hain jo apne piche na mitne wale nishanaat chorr jati hain. Sirsi Sadat ki sar-zameen ne hamesha bade bade ulema, udaba aur shua'ra ko janam diya hai. Inhi sitaron mein se ek darakhshanda sitara Janab S. Naqi Hasan Naqvi (Naqi Sirsivi Marhoom) ka tha, jinhone apni puri zindagi zikr-e-Ahlebait (a.s) aur adab ki khidmat mein guzari. ​Unki judai ka gham aaj bhi taza hai, aur unki yaad mein unke darjaat ki bulandi ke liye ek Majlis-e-Barsi (Barai-e-Isale Sawab) ka ehtemam kiya gaya hai. ​Majlis ki Tafseelaat (Schedule) ​Agar aap is roohani ijtama mein shareek hona chahte hain, to mundarja zail tafseelaat note farma len: ​Baqam (Venue): Aza Khana Kala'n Ghrabi, Sirsi Sadat (District Sambhal, U.P.) ​Tareekh (Date): 22 April 2026 (Wednesday / Budh) ​Waqt (Time): Raat thik 8:00 baje ​Khusoosi Ittila: Masturaat (khawateen) ki majlis subah 10:00 baje marhoom ke makan par munaqad hogi. ​Khatib aur Marsiya Khwan ​Is ...