सहीह मुस्लिम: हदीस नंबर 6220 (2404)​बुकैर-बिन-मिस्मार ने आमिर-बिन-सअद-बिन-अबी-वक़्क़ास से, उन्होंने अपने वालिद से रिवायत की कि मुआविया-बिन-अबी-सुफ़ियान ने हज़रत सअद (रज़ि०) को हुक्म दिया, कहा: "आपको इससे क्या चीज़ रोकती है कि आप अबू-तुराब (हज़रत अली-बिन-अबी-तालिब अलैहिस्सलाम) को बुरा कहें?"​उन्होंने जवाब दिया: "जब तक मुझे वो तीन बातें याद हैं जो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन (हज़रत अली अलैहिस्सलाम) से कही थीं, मैं हरगिज़ उन्हें बुरा नहीं कहूँगा। उनमें से कोई एक बात भी मेरे लिये हो तो वो मुझे सुर्ख़ ऊँटों से ज़्यादा पसन्द होगी:​मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से सुना था, आप उनसे (उस वक़्त) कह रहे थे जब आप एक जंग में उनको पीछे छोड़कर जा रहे थे और अली (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा था: 'अल्लाह के रसूल! आप मुझे औरतों और बच्चों में पीछे छोड़कर जा रहे हैं?' तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उनसे फ़रमाया: 'तुम्हें ये पसन्द नहीं कि तुम्हारा मेरे साथ वही मक़ाम हो जो हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) का मूसा (अलैहिस्सलाम) के साथ था, मगर ये कि मेरे बाद नुबूवत नहीं है।'​इसी तरह ख़ैबर के दिन मैंने आप (सल्ल०) को ये कहते हुए सुना था: 'अब मैं झंडा उस शख़्स को दूँगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत करता है और अल्लाह और उसका रसूल उससे मुहब्बत करते हैं।' कहा: फिर हमने इस बात (को जानने) के लिये अपनी गर्दनें उठा-उठाकर (हर तरफ़) देखा तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: 'अली (अलैहिस्सलाम) को मेरे पास बुला भेजो।' उन्हें ऐसी हालत में लाया गया कि उनकी आँखें बहुत दुःख रही थीं। आपने उनकी आँखों में अपना मुँह का लुआब लगाया और झंडा उन्हें अता फ़रमा दिया। अल्लाह ने उनके हाथ पर ख़ैबर फ़तह कर दिया।​और जब ये आयत उतरी: (तो आप कह दें: आओ) हम अपने बेटों और तुम्हारे बेटों को बुला लें। (आयत-ए-मुबाहिला), तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने हज़रत अली (अलैहिस्सलाम), हज़रत फ़ातिमा (अलैहिस्सलाम), हज़रत हसन (अलैहिस्सलाम) और हज़रत हुसैन (अलैहिस्सलाम) को बुलाया और फ़रमाया: 'ऐ अल्लाह! ये मेरे घरवाले (अहले-बैत) हैं।'"​हकीकत और विचार​यह रिवायत वाज़ह करती है कि:​हज़रत सअद बिन अबी वक़्क़ास (रज़ि०) ने उन दबावों के बावजूद मौला अली (अ०) की शान में गुस्ताखी करने से साफ़ इनकार कर दिया था।​मौला अली (अ०) का मक़ाम अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल०) की नज़रों में क्या है, यह इस हदीस के तीनों वाकयात (मंज़िलत, ख़ैबर और मुबाहिला) से साबित होता है।

सहीह मुस्लिम: हदीस नंबर 6220 (2404)

​बुकैर-बिन-मिस्मार ने आमिर-बिन-सअद-बिन-अबी-वक़्क़ास से, उन्होंने अपने वालिद से रिवायत की कि मुआविया-बिन-अबी-सुफ़ियान ने हज़रत सअद (रज़ि०) को हुक्म दिया, कहा: "आपको इससे क्या चीज़ रोकती है कि आप अबू-तुराब (हज़रत अली-बिन-अबी-तालिब अलैहिस्सलाम) को बुरा कहें?"

​उन्होंने जवाब दिया: "जब तक मुझे वो तीन बातें याद हैं जो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन (हज़रत अली अलैहिस्सलाम) से कही थीं, मैं हरगिज़ उन्हें बुरा नहीं कहूँगा। उनमें से कोई एक बात भी मेरे लिये हो तो वो मुझे सुर्ख़ ऊँटों से ज़्यादा पसन्द होगी:

  1. ​मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से सुना था, आप उनसे (उस वक़्त) कह रहे थे जब आप एक जंग में उनको पीछे छोड़कर जा रहे थे और अली (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा था: 'अल्लाह के रसूल! आप मुझे औरतों और बच्चों में पीछे छोड़कर जा रहे हैं?' तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उनसे फ़रमाया: 'तुम्हें ये पसन्द नहीं कि तुम्हारा मेरे साथ वही मक़ाम हो जो हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) का मूसा (अलैहिस्सलाम) के साथ था, मगर ये कि मेरे बाद नुबूवत नहीं है।'
  2. ​इसी तरह ख़ैबर के दिन मैंने आप (सल्ल०) को ये कहते हुए सुना था: 'अब मैं झंडा उस शख़्स को दूँगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत करता है और अल्लाह और उसका रसूल उससे मुहब्बत करते हैं।' कहा: फिर हमने इस बात (को जानने) के लिये अपनी गर्दनें उठा-उठाकर (हर तरफ़) देखा तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: 'अली (अलैहिस्सलाम) को मेरे पास बुला भेजो।' उन्हें ऐसी हालत में लाया गया कि उनकी आँखें बहुत दुःख रही थीं। आपने उनकी आँखों में अपना मुँह का लुआब लगाया और झंडा उन्हें अता फ़रमा दिया। अल्लाह ने उनके हाथ पर ख़ैबर फ़तह कर दिया।
  3. ​और जब ये आयत उतरी: (तो आप कह दें: आओ) हम अपने बेटों और तुम्हारे बेटों को बुला लें। (आयत-ए-मुबाहिला), तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने हज़रत अली (अलैहिस्सलाम), हज़रत फ़ातिमा (अलैहिस्सलाम), हज़रत हसन (अलैहिस्सलाम) और हज़रत हुसैन (अलैहिस्सलाम) को बुलाया और फ़रमाया: 'ऐ अल्लाह! ये मेरे घरवाले (अहले-बैत) हैं।'"

​हकीकत और विचार

​यह रिवायत वाज़ह करती है कि:

  • हज़रत सअद बिन अबी वक़्क़ास (रज़ि०) ने उन दबावों के बावजूद मौला अली (अ०) की शान में गुस्ताखी करने से साफ़ इनकार कर दिया था।
  • ​मौला अली (अ०) का मक़ाम अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल०) की नज़रों में क्या है, यह इस हदीस के तीनों वाकयात (मंज़िलत, ख़ैबर और मुबाहिला) से साबित होता है।

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