बुढापा/बुज़ुर्गी✍️✍️
बुढापा/बुज़ुर्गी✍️✍️
इंसानी जिंदगी का सबसे कीमती और अहम वक़्त।
कीमती इसलिए क्योंकि यही वो वक़्त होता है जब इंसान तमाम तरीके के तजुर्बे हासिल कर चुका होता है यही वो वक़्त है जब इंसान अच्छे और बुरे में फर्क करने की समझ रखता है।
अहम इसलिए क्योंकि इस वक़्त इंसान को सबसे ज़्यादा ज़रूरत अपने परिवार की होती है,कौनसा परिवार?? वही परिवार जिसके लिए उसने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया,जब उसे अपने बारे में सोचना चाहिए था उस वक़्त उसने अपने उन बच्चों के लिए मेहनत की जो आज उसे अपना समय देने से भी कतराते हैं। उसने ज़िंदगी भर तुम्हारे लिए जो किया उसका बदला तो तुम चुका नहीं सकते लेकिन वह बस इतना चाहता है के जब उसका दिमाग उसका साथ छोड़ दे जब वह शरीर से लाचार हो जाये ,जब उसकी समझ उसका साथ छोड़ दो तो उस वक़्त तुम उसके साथ अच्छा सुलूक करो बजाए इसके के तुम उसे एक बोझ मानकर उसका अनादर करो।
इंसान पूरी ज़िंदगी भाग दौड़ में लगा रहता है ,बचपन से जवानी तक वह बेपरवाह बना रहता है अपनी ही मस्ती में मस्त रहता है वह अपने लिए ज़्यादा कुछ नहीं कर पाता।जब वह पारिवारिक रिश्तों में बंध जाता है है तो अपनी जीविका चलाने के लिए घर को आरामदायक बनाने के लिए अनेक कष्ट झेलता है वह अपने बारे में सोचना बंद कर चुका होता है उसे परवाह है तो बस उसके परिवार की, अपने उन बच्चों की जिनके लिए वह आशा करता है के वह इन्हें एक बेहतर ज़िंदगी दे सके,अच्छी से अच्छी शिक्षा देकर उन्हें समाज में एक अहम स्थान दिला सके।इसके बदले में वह उनसे कोई आशा नहीं करता है,वह तो उन्हें अपना सब कुछ दे देता है और बस इतनी सी उम्मीद करता है के जब उसके चेहरे पर झूर्रियाँ पड़ चुकी हो,उसकी आँखों की रोशनी कम हो चुकी हो,जब उसे दो कदम चलने पर भी थकान का अनुभव हो उस वक़्त तुम उसके साथ खड़ा हों।वह बस इतना चाहता है के जिस तरह से उसने जब तुम चल नहीं पाते थे तो तुम्हे चलना सिखाया,जब चलते चलते तुम ठोकर खाकर गिर जाते थे तो वह तुमसे झुँझलाता नहीं था बल्कि मुस्कुरा कर तुम्हे अपने हाथों का सहारा देता था।जब तुम अपने हाथों से खाना नहीं खा पाते थे तो उसने तुम्हे अपने हिस्से का खाना भी दिया।अब इस वक़्त तुम्हारा ये फ़र्ज़ बनता है के तुम भी उसका उतना ही ख्याल करो जितना उसने तुम्हारा ज़िन्दगी भर किया।उसका भी परिवार था वो भी दुनियावी रिश्तों में उलझा हुआ था लेकिन फिर भी वो तुम्हे अपना कीमती समय देता था।
मगर हर व्यक्ति को आखरी वक़्त में उस तरीके का सम्मान नहीं मिल पाता है जो उसे मिलना चाहिए था।जिस परिवार के लिए उसने ज़िंदगी भर संघर्ष किया,अंत में वह उसी परिवार से हार जाता है।
अपनी ज़िंदगी में इंसान इस कदर उलझ जाता है कि ज़िन्दगी देने वाले को ज़िन्दगी में पेश आने वाली उलझनों की तरह ही एक उलझन मान लेता है इंसानी जिंदगी का कम होना भी खुदा का दिया हुआ एक तोहफा ही है नहीं तो इंसान अपने आप में ही रोज़ घुट घुटकर मरता रहता ।
इंसान का एक अरसे बाद इस दुनिया से चले जाना उसके लिए एक नेमत की तरह है।
शुक्र है उस खुदा का जिसने इंसानी ज़िन्दगी को खत्म होने वाली बनाया है।हर किसी की ज़िंदगी में एक दिन ऐसा आना है
जब वह दूसरों का मोहताज होगा। उस दिन उसे अहसास होगा उसने जो कुछ किया अच्छा किया या ज़िन्दगी की सबसे बड़ी गलती की।
वक़्त सबका आना है अच्छा होगा या बुरा यह वक़्त गुज़रते गुज़रते समझ आजाता है
कभी कभी इंसान द्वारा लगाए गए अंदाज़े गलत भी साबित हो जाते हैं ज़िन्दगी और मौत की हकीकत हमारी सोच से परे है।
इसे इंसान अपने द्वारा लगाए गए कयासों के ज़रिए समझ नहीं सकता।(खत्म होने वाली ज़िन्दगी के नाम✍️✍️)
Written by. Adnan Zaidi
Posted by. Sirsi Sadat Azadari





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